शहर के शैदाई

शीशों की आँख में रौशनी कम है
वक़्त की दौड़ती देह नम है
दिन की मायूसी में ताप गरम है
मगर शहर के शैदाई हम हैं
सब कर जाने का वहम है
पर सब कर जाने से ज़खम है
शहद बहरूपिया कड़वा मलहम है
गटक जाने में शरम है
और मुस्कुराने का भरम है
बेढब मतलब पर सब कायम है
भागते चोर की लंगोट का गम है
चाँद पर जाने की धक्का धक्कम है
लाइन तोड़ना खुल्ला खुल्लम है
पैंट जेब में धेला रकम है
बुशट जेब में लीक कलम है
साइन करा के मिलता सितम है
कागज़ पूरे हैं, कागज़ का बम है
सोते में मूंछें कटने का मौसम है
तिनके वाली दाढ़ी सरगम है
ये तान बजाने वाले रेशम है
बाकी कपास के बेसुर हारमोनियम हैं
हल्ले से लैस हमेशा हरदम हैं दीवारें पेंट करने का कार्यक्रम है लिखता करम है दिखता धरम है दुकान में बिकता हुआ बबलगम है पाँव में चिपकने का नियम है उतार कर फेंकना स्वयं है पर स्वयं में खुदी बेदम है और बाकी सब सक्षम हैं


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