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एक रोड-शो: रोड क्या दिखती है

अपने शुरुआती वर्षों में, मैं जयपुर में रहता था। तब तक "सांगानेर रोड" के अलावा (जो मेरे घर के पते का हिस्सा थी), मैंने सड़कों के बारे में ज्यादा सुना या परवाह नहीं की थी । जब मैं अपने hometown ऋषिकेश गया, तो मैंने पाया कि शहर में दो मुख्य सड़कें थीं जो शहर की मुख्य सीमा को परिभाषित करती थीं। एक थी हरिद्वार रोड और दूसरी थी देहरादून रोड. हरिद्वार रोड आपको हरिद्वार ले जाती थी , और देहरादून रोड आपको देहरादून ले जाती थी ।

मैं अक्सर यह सोचता था कि न तो देहरादून में और न ही हरिद्वार में, ऋषिकेश रोड क्यों नहीं है? उस समय भी ऐसे बहुत सारे लोग थे (मग़र अब के मुक़ाबले आधे भी नहीं) जो उन दो शहरों समेत और कई शहरों से ऋषिकेश आते थे, लेकिन उनके किसी के भी शहर में ऋषिकेश रोड नाम की कोई सड़क नहीं थी। तो फिर वो कौनसी रोड से ऋषिकेश पहुँचते होंगे?

कुछ दिन पहले इसके बारे में सोचते-सोचते मैंने उन बचपन की सड़कों के नामों के बारे में ढूँढना शुरू किया । दिलचस्प बात यह पता चली कि आधिकारिक सूची में मुझे हरिद्वार या देहरादून रोड नहीं मिली। इन आधिकारिक सड़कों का नाम कई हिस्सों में बँटा है और विभिन्न हिस्सों का नाम उन पर पर स्थित शहरों के नाम पर रखा गया है। तो ऐसा लगता है कि व्यापक रूप से आम बातचीत में उपयोग किए जाने वाले सड़कों के नाम वो नाम हैं (जिनमें दुकानों के बोर्ड पर लिखे हुए सड़कों के नाम भी शामिल हैं) जिन्हें लोगों द्वारा मान्यता दी गयी है। जरूरी नहीं है कि वो कोई क़ानूनी नाम हों।

ज़िंदगी की सड़कों पर चलते हुए, मुझे सड़कों के बारे में ऐसे और भी अनुभव और विचार मिले हैं। लगभग 18 साल पहले, मैं एक इंटर्नशिप के लिए मध्य भारत के एक ग्रामीण जिले में था। मैं केंद्र सरकार के 'काम के बदले अनाज' के कार्यक्रम का दस गांवों में एक सामाजिक ऑडिट सर्वेक्षण कर रहा था। उस दौरान मैं अपने दो अन्य साथियों के साथ दिन भर जंगल की पगडंडियों पर चलने के बाद शाम को एक गाँव में पहुँचा। हमें अपने सहयोगी संगठन से जुड़े एक स्थानीय ग्रामीण परिवार के घर पर रुकना था । जब हम उस घर में पहुंचे तो वहां एक कमरे में महिलाएं रो रही थीं। पूछने पर पता चला कि हमारे मेज़बान का बेटा साँप के काटने से मर गया है। कुछ देर बाद मैंने अपने एक स्थानीय सहयोगी मित्र, जो हमारे साथ चल रहे थे, से कहा कि यदि यहां सड़क होती तो व्यक्ति समय पर अस्पताल पहुंच सकता था। यह सुनकर मित्र क्रोधित हो गया और बोला कि सड़कों ने ही तो उन सबका अस्तित्व नष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा उन्हें सड़कें नहीं चाहिए। 21 साल की उम्र में मैं उनके गुस्से को पूरी तरह से नहीं समझ सका, लेकिन मैं महसूस कर सकता था कि उनका गुस्सा और दर्द कितना असली था।

ठीक दस साल बाद, युतिका और मैं भारत का भ्रमण करने के लिए कई सड़कों पर निकले, जो हमें भारत के विभिन्न छोटे शहरों तक ले गईं। हमारी कई यात्राओं में, हम ऐसे शहरों/कस्बों में गए जो दो बड़े शहरों को जोड़ते थे। फिर बाद में इन शहरों और कस्बों को बायपास करने के लिए एक नया बाईपास बना दिया गया। इन सुनसान सड़कों से गुजरते हुए आपको इन शहरों के अतीत की भुतहा परछायीयाँ दिख जाएँगी । कलम के एक झटके से और सैकड़ों किलोमीटर दूर कुछ कार्यालयों में कुछ फाइलों द्वारा इन कस्बों का भाग्य हमेशा के लिए बदल गया। हम नहीं जानते कि हम ऐसे कितने शहरों और गांवों से गुज़रे जिनके अच्छे दिन उनके पीछे छूट चुके थे। वास्तव में, हमारी यात्रा के आरंभ में ही मेरे मन में बाईपास के बारे में कई तरह की भावनाएँ थीं और मैंने उस समय भी एक नोट लिखा था। उस नोट का एक अंश नीचे डाल रहा हूँ

मैंने युतिका से कहा कि बाईपास शायद एक शहर को अन्यायपूर्ण लगता होगा और शहर इससे बहुत खुश नहीं होगा। मुझे बहुत दुख हुआ, खासकर जब मैं चित्तौड़ को बायपास कर रहा था क्योंकि मैं उस विजय स्तंभ को देखना चाहता था जिसे मैंने अपने सामान्य ज्ञान और इतिहास की किताबों में देखा था. (जिन्होंने बायपास बनाया) उनका कहना यह था कि यह ज़्यादा काम का रास्ता है, क्योंकि आपको ट्रैफिक में नहीं फंसना पड़ेगा। मैं उस बात से तो सहमत हो सकता हूँ क्योंकि जब मैं घर जाता हूं तो मैं मेरठ और मुजफ्फरनगर बाईपास लेना पसंद करता हूं। मगर ये बात भी तो वाजिब है कि यदि शहरों में अधिक यातायात नहीं होता तो किसी को बाईपास बनाने और फिर दूसरों को बाईपास लेने के लिए मजबूर करने की आवश्यकता नहीं होती। फिर कोई शहर को बायपास करने के बजाय उससे होकर जा सकता था।

ये पोस्ट लिखते हुए मैं ये सोचने लगा कि अगर २० साल पहले वाले मेरे वो दोस्त जो उस समय जंगल में ग़ुस्सा हो गए थे, इन बायपास और नज़रंदाज़ कस्बों के किसी भी व्यक्ति से मिलते, तो वे सड़कों के बारे में क्या बात करते ? शायद दोनों इस बात पर एक दूसरे से सहानाभूति जताते कि सड़कों ने कैसे उनकी और उनके समुदायों की तक़दीर लिखी और बदली है। जहां एक सड़कों के आ जाने पर शोक मनाता , वहीं दूसरा इनके चले जाने पर।

सड़कों के बारे में यह सब सोचते समय मुझे एक बात का एहसास हुआ कि हमें अपने शहरों में सड़कों या हमारे जीवन में उनके महत्व के बारे में नहीं बताया गया है। हो सकता है कि व्यापार और अर्थव्यवस्था के विकास में उनकी क्या भूमिका है -उन बातों पर कभी ज़ोर दिया हो और मुझे यकीन है कि सभी को जी.टी. रोड के बारे में पढ़ाया गया होगा। लेकिन हमारे अपने शहरों की सड़कों के लिए शायद ही कभी कोई पाठ पढ़ाया गया होगा। हमारी नगर-नगर (शाब्दिक रूप से शहर-से-शहर) यात्रा में, हमने देखा कि कैसे सड़कों के इतने सारे मायने थे और वो खामोश होने के बावजूद भी अपने स्थान और समय के बारे में कितना कुछ बताती थी। हमें सड़कों ने कनेक्टिविटी, आर्थिक गतिविधि, बोली जाने वाली भाषाओं, सामाजिक और सामुदायिक जीवन, सांस्कृतिक विविधता, विरासत, बुनियादी ढांचे की स्थिति, शासन की गुणवत्ता और ऐसी बहुत सारी चीजों के बारे में बहुत कुछ बताया।

यह अक्सर कहा जाता है कि सड़कें शहरों के लिए वैसी ही होती हैं जैसी शरीर के लिए नसें होती हैं, और मैंने हमेशा सोचा था कि नसें होना अच्छी बात है। लेकिन अधिकांश चीज़ों की तरह, सड़कों की भी दोहरी प्रकृति होती है, और वे किसी शहर को बना या बिगाड़ सकती हैं। हमारे लिए अच्छा होगा अगर हम अपनी नसों को पकड़ना अच्छे से सीख जाएँ।

 
 
 

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